Wednesday, 25 January 2017

गणतंत्र दिवस की पूर्व रात्रि जब खाना खा कर सोया था


गणतंत्र दिवस की पूर्व रात्रि जब खाना खा कर सोया था
अपने स्वदेश की चिंता मेंकुछ सोच सोच मैं रोया था



सुनकर आहट कुछ क़दमों की साँसें थीं मेरी थमी हुई
हैरान था मन उस छाया पर आँखें थीं मेरी जमी हुई
पूछा मैंने फिर -कौन हो तुम,क्यों हो थोड़ी सी डरी हुई
कुछ बोलो भी क्यों मौन हो तुम क्यों आँख है तेरी भरी हुई



कुछ शब्द जो उसने कहे तभी,सुनकर पहुंचा दिल को सदमा
मेरा परिचय क्या पूछते हो, वो बोलीं -”मैं हूँ भारत माँ”
हालत पाकर अपनी माँ की,वह देख के दिल था तड़प उठा
छाया था आगे अँधेरा सुनकर उनकी वो दर्द व्यथा



डरती हूँ मैं बस अपनों से करते हैं मेरा ख्याल नहीं
अपनी माँ की रक्षा जो करे,क्या ऐसा कोई लाल नहीं ?



भ्रस्टाचारी कुछ लोग हैं जो आतंक भय फैलाते हैं
नारी है जो देवी सामान उन्हें पाकर भूख मिटाते हैं
कुछ धन-दौलत की चाह में जो दूजों का खून बहाते हैं
धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो जीवन ऐसा पाते हैं



कहते-कहते माँ फूट पड़ीं बोली वादा तू मुझसे कर
धर्म,नीति,के रास्तों में रहना है तुझे अविरल-अविचल



लेटा मैं उनके चरणों में बोल आशीष मुझे दो माँ
कर सेवा तेरी सत्य से ही फिर कर दूँ अपना देश महान

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