Wednesday, 25 January 2017

अपने अंजाम-ए-मोहब्बत को भूल कर बैठा

अपने अंजाम-ए-मोहब्बत को भूल कर बैठा
आज फिर आदमी बनने की भूल कर बैठा


रब से माँगा था वक़्त तुझसे बातें करने को
वक़्त पाया तो मैं बातें फ़िज़ूल कर बैठा


बाद मुद्दत के मुझे थोड़ी सी खुशियाँ जो मिलीं
उनको मंजिल समझ मैं फिर गुरूर कर बैठा


अपनी आदत से मैं मजबूर एक आशिक़ हूँ
आज इज़हार-ए-मोहब्बत हुज़ूर कर बैठा


आज गुज़रा हुआ हर वक़्त मुझसे कहता है
हाय ‘कुंदन’ तू ये इश्क में क्या कर बैठा l

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