Friday, 20 January 2017

रो पड़ी फिर आज धरती, हाय ! ये फिर क्या हुआ

रो पड़ी फिर आज धरती, हाय ! ये फिर क्या हुआ
गोद में मेरी ये ये कैसा रक्त है बिखरा हुआ

कल तलक थे चैन में जो,आज वो बेचैन हैं
आज इस हलचल में ये,बरसे हुए क्यों नैन हैं

बूढ़े बच्चे और जवाँ, ख़ामोश थे सोये हुए
देख कर यह दृश्य थे भगवान भी रोये हुए

थी सभी की आत्माएं एक आहें भर रहीं
खो रहा इंसान है.इंसानियत भी मर रही

रह रही इन बस्तियों में एक नन्ही जान है
था जो ख़ुशियों से भरा घर,बन गया शमशान है

हे मनुज ! तू जाग जा,अब वक़्त वो है आ गया
डाल डेरा सबके मन पर,है अँधेरा छा गया

गर नहीं बदला तू अब तो,नष्ट होगी ये धरा
गूंजता होगा ये स्वर,शमशान में तब दुःख भरा

No comments:

Post a Comment