Wednesday, 25 January 2017

रोटियां हिस्से की मेरी, अब मुझे मिलतीं नहीं

रोटियां हिस्से की मेरी, अब मुझे मिलतीं नहीं
पूछता हूँ, रोटियां आख़िर वो खाता कौन है


आज कल मंडप का दूल्हा, बनता भ्रष्टाचार है
बन गयी दुल्हन शराफ़त पर पुजारी कौन है


मैं ख़ुदी को भूलकर उनको दिलाया शोहरतें
एक गुमनामी के कारण क़द मेरा अब बौन है


है भरा धुओं से कमरा, पर मैं साँसें ले रहा
इन विषैली सी धुओं में वो हवा अब गौण है


सदियों से ताले पड़े हैं आज तक इस कमरे में
रात के सन्नाटे में आवाज़ देता कौन है


कल रही चर्चा शहर में कि बड़ा बुज़दिल हूँ मैं
देख जलता घर मेरा अब लोग सारे मौन हैं


आज मेरी बेबसी पर है हवा भी रुक गयी
है कलम थम सी गयी, और शब्द भी अब मौन है

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