Wednesday, 25 January 2017

गणतंत्र दिवस की पूर्व रात्रि जब खाना खा कर सोया था


गणतंत्र दिवस की पूर्व रात्रि जब खाना खा कर सोया था
अपने स्वदेश की चिंता मेंकुछ सोच सोच मैं रोया था



सुनकर आहट कुछ क़दमों की साँसें थीं मेरी थमी हुई
हैरान था मन उस छाया पर आँखें थीं मेरी जमी हुई
पूछा मैंने फिर -कौन हो तुम,क्यों हो थोड़ी सी डरी हुई
कुछ बोलो भी क्यों मौन हो तुम क्यों आँख है तेरी भरी हुई



कुछ शब्द जो उसने कहे तभी,सुनकर पहुंचा दिल को सदमा
मेरा परिचय क्या पूछते हो, वो बोलीं -”मैं हूँ भारत माँ”
हालत पाकर अपनी माँ की,वह देख के दिल था तड़प उठा
छाया था आगे अँधेरा सुनकर उनकी वो दर्द व्यथा



डरती हूँ मैं बस अपनों से करते हैं मेरा ख्याल नहीं
अपनी माँ की रक्षा जो करे,क्या ऐसा कोई लाल नहीं ?



भ्रस्टाचारी कुछ लोग हैं जो आतंक भय फैलाते हैं
नारी है जो देवी सामान उन्हें पाकर भूख मिटाते हैं
कुछ धन-दौलत की चाह में जो दूजों का खून बहाते हैं
धिक्कार है ऐसे लोगों पर जो जीवन ऐसा पाते हैं



कहते-कहते माँ फूट पड़ीं बोली वादा तू मुझसे कर
धर्म,नीति,के रास्तों में रहना है तुझे अविरल-अविचल



लेटा मैं उनके चरणों में बोल आशीष मुझे दो माँ
कर सेवा तेरी सत्य से ही फिर कर दूँ अपना देश महान

माँ

वो मुझसे दूर रहकर भी मेरा हर ग़म समझती है
कभी बीमार हो जाऊं तो सारी रात जगती है
कभी बेटे के दिल का दर्द माँओं से नहीं छिपता
मैं जब हँसता हूँ, माँ हँसते हुए चेहरे को पढ़ती है !!

————-
बड़े ही प्यार से हर गलतियाँ मेरी छिपाती है
मेरी नाकामियों को भी वो सीने से लगाती है
मुझे हज की नहीं परवाह ना ही चारों धामों की
क़दम उसके मैं चूमूँ दुनिया जिसको ‘माँ’ बुलाती है !!

आज फिर दिन वो पुराना मुझे याद आया है

आज फिर दिन वो पुराना मुझे याद आया है
आज मौसम वो सुहाना मुझे याद आया है


सहसा आज किसी ने जो पुकारा मुझको
तेरा धीरे से बुलाना मुझे याद आया है


मुद्दतों बाद किसी ने मेरा चेहरा देखा
मेरे चेहरे का फ़साना मुझे याद आया है


देख शबनम सी हँसी आज उनके चेहरे पर
मुझे हर ग़म में हँसाना मुझे याद आया है


मेरी बातों से ख़फ़ा ना हो मोहब्बत है ये
किसी रूठे को मनाना मुझे याद आया है


चलो इस बात को अब दफ़न यहीं करते हैं
फ़िर कोई ज़ख्म पुराना मुझे याद आया है


अब न छेड़ो ये मोहब्बत के तराने ‘कुंदन’
फिर कोई ख्व़ाब सजाना मुझे याद आया है l


कहाँ गई दिवाली ?


कई दिनों से सोच रहा था दिवाली पर कुछ लिखूं परंतु एक दुसरे ख़याल ने रोक रखा था और वैसे भी आज-कल लेखों का महत्व नहीं रहा ,फिर भी आदत से मजबूर हूँ कलम चल पड़ी l
आज कल सोशल मिडिया पर ”क्रेकर फ्री दिवाली” का मुद्दा ज़ोरों पर है कई इसके समर्थक हैं और कई लोग विरोध भी कर रहे हैं l सबसे अहम् बात यह है कि इन बहस के पीछे उनका कोई धार्मिक मकसद नहीं है बल्कि बदले की भावना है, खैर छोड़िये इन बातों को …हम कुछ अलग बात करते हैं l
बचपन में हम दीपावली के बारे में अनेक कहानियां सुन चुके हैं मसलन- श्री राम के वापस अयोध्या आने पर दिवाली मनाई गयी..आदि l आज हम बड़े हो चुके हैं सही-गलत का निर्णय हम स्वयं ले सकते हैं और यही कारण है कि अब हमें किसी कहानी की आवश्यकता नहीं होती और न ही बड़े सुनाते हैं l दिवाली वह त्यौहार है जो हर घर में रौशनी लाता है, यह अंधकार पर प्रकाश की जीत को दर्शाता है और इसी वजह से लोग दीपों की पंक्ति को सजाकर जलाने लगे और इसे “दीपावली” का नाम दिया गया l
पुराने ज़माने में सारा गाँव दिवाली मनाता था पर अब दिवाली ‘’घरों’’ में होती है अर्थात हम अपने तक सिमट कर रह गए हैं दुसरे शब्दों में यह कहें कि हम स्वार्थी हो चुके हैं l अब आप कहेंगे इसमें स्वार्थ कैसा हम तो अब भी घर के बाहर ही दिवाली मनाते हैं, जी हाँ आप बिलकुल सही हैं पर यही बात आपको स्वार्थी बनाती है l क्या आप जानते हैं कि जब आप तेज आवाज वाले बम व पटाखे छोड़ते हैं तो कई लोगों को पीड़ा पहुँचती है और उनमे कई दिल के मरीज़ होते हैं इसके अलावा बूढ़े ,बच्चे सभी थर्रा उठते हैं और उनकी दिवाली की रात बहुत दर्द्नाक बन जाती है l पशु-पक्षी की तो बात ही छोडिये ..हर धमाकों से वो सिहर उठते हैं और बेचैन होकर उड़ने लगते हैं l
हर शहर में एक ऐसा तबका होता है जो अपनी ज़िन्दगी सड़कों (फूटपाथ) पर बिताते हैं और उनके बच्चे भी उनसे पटाखे और मिठाईयाँ मांगते हैं जो हर बच्चे का अधिकार है l प्रदूषण मुक्त दिवाली का ज्ञान ना देते हुए मैं आपसे इतनी गुजारिश करता हूँ कि पटाखे पर रुपये ना खर्च करके उन पैसों से मिठाईयां खरीदकर सड़कों पर बसे लोगों के साथ दिवाली मनाईये..भले ही अन्य चीजों में आज गारंटी नहीं मिलती पर मैं आपको इस बात की पूरी गारंटी देता हूँ कि यह पल आपकी पूरी ज़िन्दगी का सबसे सुखद पल होगा ..और हाँ अगर आप ऐसा नहीं कर रहे हैं, कोई बात नहीं पर तेज़ धमाकों वाली बम का इस्तेमाल नहीं करें ..क्योंकि अगर हम किसी को सुख नहीं दे सकते तो हमें उनकी ख़ुशी छीनने का भी कोई हक़ नहीं है –
”मैं ये नहीं कहता कि औरों के घर दिए जलाओ,
मेरी इल्तज़ा है कि किसी के घर का ‘दिया’ न बुझे”
व्यक्तिगत तौर पर मुझे दिवाली कहीं नहीं मिल रही है ..बस हर जगह धमाकों की आवाजें ..क्या आपने देखी है ..अगर नहीं तो मिल कर खोजें हमारी खोई दिवाली ..आख़िर कहाँ गई दिवाली ?

ज़माने में मोहब्बत यूँ अगर आबाद न होती

ज़माने में मोहब्बत यूँ अगर आबाद न होती
न तू होती न मैं होता हमारी बात न होती


जमाले-हुस्न से तेरे मेरा दिल था कभी रौशन
तेरा गर साथ रहता फिर यहाँ पर रात न होती


ज़मीं और आसमाँ के दरम्याँ कुछ तो मोहब्बत है
अज़ाब – ए – अब्र से वरना कभी बरसात न होती


सियासत मुल्क़ में करता खड़ी नफ़रत की दीवारें
वगरना दो दिलों में इस क़दर ये आग न होती


शरीफ़ों से उसे इज्ज़त की रोटी का तसव्वुर था
वो रख कर जिस्म गिरवी,खाने की मोहताज़ न होती


तेरी बातों का कोई भी असर होगा नही ‘कुंदन’
ग़ज़ल से फ़र्क पड़ता तो ,तो ये हालत आज न होती



ख़ुशी के रंग बिखराओ कि होली आज आई है

ख़ुशी के रंग बिखराओ कि होली आज आई है
ग़मों को भूल कर आओ कि होली आज आई है


यहाँ बस्ती में कोई रंग से ताल्लुक नहीं रखता
ये कालापन हटा जाओ कि होली आज आई है


बुराई दूर करने से ये रंगें आप बनती हैं
सभी मिलकर क़सम खाओ कि होली आज आई है


कई चेहरे हैं जिनको रंग कोई भी नहीं भाता
उन्हें रंगीन कर आओ कि होली आज आई है


हटा दो धर्म-मजहब की खड़ी दिल पर ये दीवारें
तो मिल के गीत यह गाओ कि होली आज आई है


सभी रंगें अगर मिल जाए तो उजला ही बनता है
उजाला मिल के फैलाओ कि होली आज आई है


ना कर परवाह ‘कुंदन’ की तेरा बेरंग चेहरा है
कभी गैरों को रंग जाओ कि होली आज आई है

अपना ग़म अक्सर यूँ ग़ैरों से छुपाओ तो सही

अपना ग़म अक्सर यूँ ग़ैरों से छुपाओ तो सही

ग़म का साया दूर होगा मुस्कुराओ तो सही


रास्ते है जो भी पत्थर ख़ुद-ब-ख़ुद हट जाएगा

हौसला मज़बूत कर तुम बढ़ते जाओ तो सही


सेज गर फूलों का हो तो नींद अच्छी क्यों न हो

काटों के बिस्तर पे सो कर अब दिखाओ तो सही


ज़िन्दगी कुछ भी नहीं बस एक महज संघर्ष है

वीर की तरह इसे जी कर दिखाओ तो सही


ये ज़माना कुछ भी कर ले हौसला मत हारना

एक क़दम आगे बढ़ाकर मुस्कुराओ तो सही


अब तेरे घर पर भी खुशियों का उजाला आएगा

दूसरों के बुझते दीपक को जलाओ तो सही


जान ले इतना कि ‘कुन्दन’ तू अकेला है नहीं

बस ख़ुदा को भूलकर ख़ुद को बुलाओ तो सही

एकता बलिदान और शान्ति का देता मंत्र है

एकता बलिदान और शान्ति का देता मंत्र है,
खूब फ़हराओ तिरंगा दिवस यह गणतंत्र है


दिन वो 26 जनवरी का सबसे गौरवमान था,
अखिल भारत में हुआ लागू वो संविधान था


खून से वीरों के ये लिक्खा हुआ इतिहास है,
कल हुआ आज़ाद भारत अब ख़ुदी का दास है


झूठ के रास्ते को छोड़ें सत्य अपनाते रहें,
हर बरस इस दिन को हम-सब यह क़सम खाते रहे


हैं मनाते आ रहे इस दिन को पैंसठ साल से,
पर न मुक्ति पा सके हम झूठ के जंजाल से


आइए खुद न्याय कर लें आईने को देखकर,
फ़ायदा कोई नहीं कीचड़ में पत्थर फेंक कर


है रहस्यों से भरा चेहरा यहाँ इंसान का,
शक्ल तो साधू का है पर अक्ल है शैतान का


दूसरों की ज़ात को यूँ ना कभी भी आँकिये,
मशवरा देने से पहले ख़ुद के भीतर झाँकिये


अब बरतिए एह्तियातें दूसरों के अर्ज़ पर,
दुश्मनी होती यहाँ है दोस्ती के तर्ज़ पर


मायने रखता नहीं कि आप इज्ज़तदार हैं,
ख़ुद कि नज़रों में सही पर आप भी ग़द्दार हैं


आज भी कुछ नौजवाँ चलते हैं नंगे पांव से,
रास्ता हर एक शहर का है निकलता गाँव से


है कटु पर बात सच्ची मुझसे मुंह ना मोड़िये,
शक्ल अपनी देख कर शीशे को यूँ ना तोड़िए l

झुकता नहीं कहीं भी कभी भी झुका नहीं


झुकता नहीं कहीं भी कभी भी झुका नहीं,
ध्वज को गिरा दे ऐसी कोई हवा नहीं
झुकता नहीं कहीं भी…….



ये तिरंगा जाँ है अपनी ध्वज है ये राष्ट्र का
उजला,हरा,केसरिया….. रंगों से ये बना
सुन्दर सा ऐसा ध्वज है कोई दूसरा नहीं
ध्वज को गिरा दे ऐसी…….



ये ध्वज है शान अपनी,झुकने न दें कभी
इसे देख दुश्मनों की हालत दबी रही
ग़द्दार वो है इसको जो जानता नहीं
ध्वज को गिरा दे ऐसी…….



इज्ज़त बचाने इसकी इतने बहे लहू
जाँ देके ख़ुद बचाएं हम इसकी आबरू
दो पल में टूट जाए वो हौसला नहीं
ध्वज को गिरा दे ऐसी…….



आओ सलाम कर लें इस प्यारे झंडे को
संदेस शान्ति का ये देता है दोस्तों
कुन्दन कहे कि ध्वज से कोई बड़ा नहीं
ध्वज को गिरा दे ऐसी…….

दुखों का बोझ यूँ सह-सह के बौना हो गया हूँ मैं


दुखों का बोझ यूँ सह-सह के बौना हो गया हूँ मैं,
सभी खेले मेरे दिल से खिलौना हो गया हूँ मैं



क़हर जो वक़्त का बरपा यकायक मेरी राहों में,
कि कल था काफ़िलों में आज तनहा हो गया हूँ मैं



मुक़द्दर से ज़ियादा कोई भी इंसाँ नहीं पाता
यही इक बात है जिससे आशुफ़्ता हो गया हूँ मैं



मुझे दौलत-ओ-शोहरत की तमन्ना है नहीं कोई,
कि इस से दूर रह-रह कर फकीरा हो गया हूँ मैं



ख़बर आयी मोहल्ले में हुआ मर कर कोई जिंदा,
करिश्मा ये ख़ुदा का देख हैराँ हो गया हूँ मैं



मेरे कुछ शेर हैं ऐसे जो समझाए नहीं जाते,
कोई समझे तो ये समझे दीवाना हो गया हूँ मैं



बड़ी ख़ामोशियों से जब सभी की बात सुनता हूँ,
ज़माना ये समझता है कि गुंगा हो गया हूँ मैं



हसीं कुछ ख्वाब दिखलाकर उन्हें, मैं मौज करता हूँ
अचानक ये कहा दिल ने कि नेता हो गया हूँ मैं



ना कोई दोस्त-ओ-दुश्मन तेरा अब है यहाँ ‘कुन्दन’
कि ख़ुद ही आज हर रिश्ते का हिस्सा हो गया हूँ मैं

तेरी जफा से यहाँ कौन गिला करता है

तेरी जफा से यहाँ कौन गिला करता है
इक तोहफा है ये अपनों से मिला करता है


ज़ख्म देकर के अपने, रहगुजर पे छोड़ गए
ग़ैर आकर कोई ज़ख्मों को सिला करता है


मेरी क़ज़ा कि तमन्ना में रोज़ जीता था
आज वो ही मेरे मरने की दुआ करता है


क्यों करूँ रंज अँधेरे में हो गया तनहा
अपना साया भी उजालों में मिला करता है


काश कि सारा ज़माना हो उसके क़दमों में
याँ हर कोई यही चाह किया करता है


यूँ तो आदत नहीं है दिल को चोट खाने की
फिर भी ये दिल मेरा,ग़मों से जिया करता है


ज़िन्दगी की ये हक़ीकत है समझ ले ‘कुन्दन’
भरोसा जिसपे हो अक्सर वो दगा करता है !

कुछ दोहे


बैर भाव सब भूल कर करो परस्पर प्रीत
ईश्वर तेरे द्वार खड़े, गाओ मंगल गीत !!
—————————-
भूखे को रोटी मिले और बेघर को छाँव
लूले को बाहु मिले और लंगड़े को पाँव !!
—————————-
सब कुछ सम्भव है जग में बस मन में तू ठान
करो मदद सब लोगों की उनको अपना जान !!

जिसे देखो वही दिल से यहाँ पर खेल जाता है

जिसे देखो वही दिल से यहाँ पर खेल जाता है
शराफत का पुजारी आज अक्सर जेल जाता है


जो कल तक दूसरों को धर्म की बातें बताता था
वो कुछ सिक्कों के ख़ातिर अपना ईमां बेच जाता है


घरों की देवियाँ सजती हैं अक्सर अब दुकानों में
कि हर ख़रीदार आकर ये सजावट देख जाता है


ज़रा सी दौलतें पायी ख़ुदा खुद को समझ बैठा
बड़े गुमान से रोटी के टुकड़े फेंक जाता है


जो कल तक हर घडी रहता था लिपटा माँ की आँचल से
वो बेटा आज माँ को छोड़कर परदेस जाता है


कि कल तक छाँव में जिसकी वो थक कर रोज़ सोते थे
उन्ही हाथों से काटा आज हर इक पेड़ जाता है


बदलते वक़्त का किस्सा बयां करता है ये ‘कुन्दन’
यहाँ हर एक गली से अब गुज़रता शेर जाता है !

रुकिये ज़रा हुजुर हमसे बात कीजिये

रुकिये ज़रा हुजुर हमसे बात कीजिये
दो पल ही सही आप मुलाक़ात कीजिये


ख़ामोश ये फ़िज़ा है तेरे इंतज़ार में
अपनी ज़ुबां से लफ़्ज़ों की बरसात कीजिये


चेहरे पे ऐसा नूर है सूरज भी ग़ुम हुआ
जुल्फें गिरा के आप यहाँ रात कीजिये


वीरान सी है ज़िन्दगी ये आपके बगैर
अपनी वफ़ा से आप ही आबाद कीजिये


दो पल कि ज़िन्दगी यहाँ कल की खबर नहीं
राह-ए-वफ़ा में दिल का ज़रा साथ कीजिये

मैं कोई बात कहूँ वो गलत समझता है

मैं कोई बात कहूँ वो गलत समझता है
वो मेरा यार मुझे अब अलग समझता है


तुम्हारी आँखों में पहली सी मोहब्बत न रही
नज़र की बात यहाँ बस जिगर समझता है


मोहब्बतों के सहारे ही दुनिया क़ायम है
ज़माना फिर क्यों इसे अब ज़हर समझता है


तेरी जफा का सितम सहके भी दीवाना हूँ
मुझे शहर का हर कोई अजब समझता है


यूँ दिल का हाल कभी मत किसी से कह ‘कुंदन’
हरेक शख्स इसे बस ग़ज़ल समझता है

गुनाहें मैं नहीं करता, मगर अफ़सोस होता है

गुनाहें मैं नहीं करता, मगर अफ़सोस होता है
सियासत का यही किस्सा यहाँ हर रोज़ होता है !


ख़ुशी से कल तलक नन्ही सी चिड़िया खूब गाती थी
न जाने आज क्यों उसके स्वरों में रोष होता है


बड़ा नादान था, ईमान की बातें सुना बैठा
वो पागल है,यहाँ चारों तरफ यह शोर होता है


पकड़ कर उँगलियाँ जिनकी सफ़र करता रहा है वो
शिकायत है उसे, माँ-बाप का क्यों बोझ होता है


न जाने कौन सी खुश्बू है फैली इन हवाओं में
ज़रा सा सांस ले लूँ तो ये दिल मदहोश होता है


बरत कर एह्तियातें तू हमेशा पैर रख ‘कुन्दन’
यहाँ इस रास्ते में हर जगह एक मोड़ होता है !

ख़ता क्या है मेरी, दिलवर ज़रा ये तो बता देना

ख़ता क्या है मेरी, दिलवर ज़रा ये तो बता देना
जो फिर आये तेरे दिल में वो तू मुझको सजा देना


इससे पहले कोई तोहमत मेरे सर पे लगा दे तू
ज़रा एक बार अपनी तू मुझे दामन दिखा देना


मेरी हर ख्वाइशें धूमिल हुईं तेरी मोहब्बत में
बस एक एहसान कर,ये नाम इस दिल से मिटा देना


हजारों यार मिल जाये सफ़र-ए-जिंदगानी में
न होगा इतना आसां यूँ किसी को फिर दगा देना


कोई शिकवा नहीं कि तूने मेरे दिल से खेला है
मगर इस खेल को अब नाम ना कोई वफ़ा देना


जलाकर आशियाँ खुश हैं मगर आंसू बहाते हैं
बहुत आसान है, इल्ज़ाम गैरों पर लगा देना


बहुत है ज़िन्दगी जी ली तेरी बेदर्द दुनियां में
यूँ जीने से ये बेहतर है,ख़ुदा मुझको क़ज़ा देना


विदा लेता है यारों आज तेरी बज़्म से ‘कुंदन’
मैं जब भी याद आऊं तुम मेरी ग़ज़लों को गा देना

न तुझे पता न मुझे ख़बर

न तुझे पता न मुझे ख़बर
यूँ मिली थी तुझसे मेरी नज़र


तेरी सादगी पे फ़िदा हुआ
मेरा दिल भी मुझसे जुदा हुआ
नहीं होश कुछ भी कि क्या हुआ
जो भी हुआ, तुझे देख कर !


हूँ जब भी आँखे मैं मूंदता..
तुझे अपनी ख्वाबों में ढूंढता
जब सब्र का मुझे फल मिला
था वो रात का पिछला पहर !


मुझे ग़ैर से, हो क्यूँ वास्ता
जो मुझे पता है ये रास्ता
ये है दिल तेरा ,मेरी दिलरुबा
न ये गाँव है न कोई शहर !


मेरी ज़िन्दगी की शान है
जीने की तू अरमान है
तुझ पर मुझे अभिमान है
मेरे दोस्त मेरे हम सफ़र !


तेरी जीत मैं मेरी हार तू
मेरा अलग संसार तू
बिछड़ा जो मुझसे यार तू
टूटे मेरे दिल पर कहर !


जब ज़िन्दगी की शाम हो
लब पर तेरा ही नाम हो
तेरे दिल में वो स्थान हो
मर कर भी हो जाऊं अमर !

हे गुरुवर, आपके चरणों में हम शत-शत शीश झुकाते हैं

अज्ञान तिमिर को दूर करे
वो ज्ञान की लौ फैलाते हैं
हे गुरुवर ! आपके चरणों में
हम शत-शत शीश झुकाते हैं


साक्षात त्रिदेव के रूप हैं वो
उनके दर्शन से पाप कटे
गुरुदेव कृपा जिसे मिल जाये
वो पल भर में इतिहास रचे
हर संकट उनसे दूर रहे
जो तेरी छाया पाते हैं
हे गुरुवर ! आपके चरणों में
हम शत-शत शीश झुकाते हैं !


अब याचक बन कर हे गुरुवर !
‘कुंदन’ तेरे दर आया है
तुझसे विद्या धन पाने को
खाली झोली फैलाया है
जिसने भी पाया ज्ञान तेरा
सर्वत्र वो पूजे जाते हैं
हे गुरुवर ! आपके चरणों में
हम शत-शत शीश झुकाते हैं !


हम पापी हैं और कपटी भी
सम्मान तेरा क्या कर पायें
इस योग्य भी नहीं हम गुरुवर
तुझको कुछ अर्पण कर पायें
कुछ टूटे-फूटे शब्दों में
हम तेरी महिमा गाते हैं
हे गुरुवर ! आपके चरणों में
हम शत-शत शीश झुकाते हैं !

वो औरत सामने जब-जब भी मेरे आज रोती है

वो औरत सामने जब-जब भी मेरे आज रोती है
मुझे लगता है यूँ घर पर मेरी माँ साथ रोती है


भटकती जिंदगी उसकी है सड़कों पे चौराहों पे
कि हालत देख उसकी खुद ख़ुदा कि आँख रोती है


महज दो-चार रोटी के लिए दर-दर भटकती वो
हजारों रोटियाँ आती यहाँ जब रात होती है


न कोई पोछने वाला है आंसू उस अभागन का
उसी के ज़ख्म ही रातों को उसके ज़ख्म धोती है


सहारा है नहीं कोई सिवा उस नन्ही सी जाँ के
कि जिसके ज़िक्र से ही वो यहाँ बदनाम होती है


ना जाने क्यों नज़ारे देख कर खामोश रहते हम
हमारे ही ज़मीं पर औरतें सम्मान खोती हैं


शरीफों की ये महफ़िल है नसीहत बंद कर ‘कुंदन’
कि कुछ गुमनाम हस्ती भी यहाँ बदनाम होती है !!

चश्मा लगा,जूते पहन, वो खुद पे ही इठलाते हैं

चश्मा लगा,जूते पहन, वो खुद पे ही इठलाते हैं
ये सड़क के छाप प्रेमी प्यार को झुठलाते हैं !


मारते सीटी बहुत हैं, लड़कियों को देख कर
कैमरे के सामने जाने से भी शर्माते हैं !


पेट भरता है न इनका,घर की रोटी-दाल से
घर के बाहर लड़कियों की सैंडिलें भी खाते हैं !


क्लास से मतलब नहीं,ये जाते बस कैंटीन हैं
जेब में पैसे नहीं ,बस नाम में लिखवाते हैं !


लड़कियों को छेड़ना और बातें करना शौक है
इम्प्रेसन भी हैं बनाते , जेब भी लुटवाते हैं !

दर्द होता नहीं है कम यूँ गुनगुनाने से

दर्द होता नहीं है कम यूँ गुनगुनाने से,
खिल उठती है मेरी रूह तेरे आने से

इक उलझन मुझे हर वक़्त परेशां करती,
मुझको आता है मज़ा क्यूँ तेरे सताने से

इश्क की लौ से तू रौशन कर दे दिल मेरा,
होगा हासिल क्या तुझे दिल मेरा जलाने से

ज़िन्दगी मेरी ढल रही तेरी जुदाई में,
आ न पाऊं कभी शायद तेरे बुलाने से

ऐ ख़ुदा ! तुझसे मांगता हूँ बस इतना सा,
उनका दीदार करा दे किसी बहाने से

उनके आंसू की तू परवाह न कर अब ‘कुंदन’,
कौन रोता यहाँ औरों के चले जाने से

ग़म की अँधेरी रात है न कोई मेरे साथ है

ग़म की अँधेरी रात है न कोई मेरे साथ है,
थे क़ाफ़िले उजालों में न कोई आज पास है


मैं इसका शोक क्यूँ करूँ कि लोग बेवफा हुए,
न कल भी कोई ख़ास था न अब भी कोई ख़ास है


तमाम उम्र मैंने तो मुसीबतों से सीखा है,
न दुश्मनों का खौफ़ था न दोस्तों कि आस है


क्यूँ मेरा हाल देखकर है फूल भी मुरझा उठा,
मैं ख़ुद भी होश में नहीं औ वो भी बदहवास है


तमाम यादें दफ़्न कर चला शहर मैं छोड़ कर,
बुलाता मुझको कौन है ये कौन अब उदास है


‘कुंदन’ तू फ़िक्र छोड़ दे यहाँ न कोई है तेरा,
क्यूँ तुझको रोके भी कोई न तू किसी को रास है

ये धरती सूखती है,तब उधर बरसात आती है

ये धरती सूखती है,तब उधर बरसात आती है
सिहर जाता हूँ मैं जब-जब भी उनकी बात आती है


मुझे हैरत है,रातों को वो कैसे नींद लेते हैं,
यहाँ हर रात ‘इनके’ रोने की आवाज़ आती है


ठहर कर इनके घर देखो तो कितना चैन मिलता है,
मुझे उनकी हवेली में ग़रीबी याद आती है


परेशाँ हो गया हूँ अब मैं उनके महफिलों से भी,
कि अब गाँवों कि चौपालों कि बातें याद आती है


ज़ुबां खामोश थे उसके वो आँखों से बताती थी,
मुझे उस गाँव की बच्ची की बातें याद आती है


ग़रीबों के घरों की अब मरम्मत कौन करता है,
हवेली की हरेक ईंटों से ये आवाज़ आती है


बहुत ही तंग आया हूँ मैं अपनों की शराफ़त से,
न जाने आज क्यूँ ग़ैरों की गाली याद आती है


शिक़ायत मत करो मुझसे कि मेरा तल्ख़ लहज़ा है,
नमक कुछ देर रखो तो नमीं भी साथ आती है


क्यूँ ‘उनका’ नाम लेने से तुझे परहेज़ है ‘कुंदन’,
कि जिनको याद तेरी पांच सालों बाद आती है

चंद शेर

फ़रिश्ते ने कहा कि साथ चल ज़न्नत दिलाता हूँ,
ख़बर उसको नहीं कि गाँव ये ज़न्नत से बढ़ कर है !!
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चलो कुछ तो हुआ उनपर असर मेरी भी बातों का,
यहाँ पर कौन किसकी बातों की परवाह करता है !
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न जाने क्यूँ मुझे उनकी यही एक बात भाती है,
वो सब कुछ जानकर भी मुझसे ही अनजान बनते हैं !!
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तुझे गुमान है ग़र तू बहुत ही खूबसूरत है,
ये शक है कि मुझे बस तेरी ही तेरी ज़रूरत है
तो सुन ले ऐ हसीं नादाँ तुझे एक बात कहता हूँ,
ज़रा सी सोच ऊंची कर तुझे इसकी ज़रूरत है !
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तेरी बज़्म में जो मैं दाखिल हुआ उठी थी निगाहें कई मेरी ओर,
मैं हैरान था कुछ परेशान भी क्यूँ तेरी नज़र है नहीं मेरी ओर !!
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अगर होता पता कि वो रखा रुमाल तेरा है,
क़सम तेरी कि उसको छूने से परहेज़ मैं करता !
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वो जो खामोश बैठी है ग़ज़ल बनकर मेरे दिल में,
उसी का प्यार है की रोज़ सुबह-ओ-शाम लिखता हूँ .
ये सच है की मेरे हर शेर उसके लफ्ज़ होते हैं,
उसी की जिद पे ही शायर में अपना नाम लिखता हूँ.
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ग़ैरों से लड़ते-लड़ते जीती है जंगें हमने,
खाकर शिक़स्त बैठे अपनों के वार से !
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पाकर दीदार उनका,तबियत सुधर गई
अच्छा भला था मैं,मेरी आदत बिगड़ गई !
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अजब फितरत है चंद लोगों की,जागते-जागते भी सोते हैं
ऐसे कुछ शख़्स और भी हैं यहाँ,हँसते-हँसते भी दिल में रोते हैं !!
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सूर्य बादलों में छिपा है,तुम कहते हो अँधेरा हुआ है
हर तरफ रौशनी बिखरी पड़ी है,तुम कहते हो सवेरा हुआ है !!!

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हम ग़रीबों पे इनायत-ए-नज़र कौन करे
तेरी बेदर्द सी दुनिया में बसर कौन करे
हम तो अपने ही घर में अपनों के सताए हैं
वरना जीने के लिए खून-ए-जिगर कौन करे !!

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कल की वो नन्हीं सी बच्ची अब सयानी हो गई
पंख फैलाकर वो अब अम्बर की रानी हो गयी
रास ना आया किसी को उसकी ये स्वछंदता
अब वही बच्ची यहाँ बीती कहानी हो गई !!

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वो लड़की आज कल किसके नशे में चूर रहती है
ना जाने कौन से हालात से मजबूर रहती है
मैं उससे दूर रहकर भी उसी के पास रहता हूँ
वो मेरे पास रह कर भी मुझी से दूर रहती है

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ज़माने को कभी गजलों में दर्द-ए-दिल बताता था
ये दुनिया तब मेरे हालात पर खुशियाँ लुटाती थी
लगी थी टूटने हर दर्द और ज़ख्मों की ज़ंजीरें
मेरी खामोशी जब मुझ पर ही दिल और जाँ लूटाती थी !!!
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हजारों लोग रहते हैं यहाँ ,ये घर नहीं कोई
है साया इनके ऊपर एक सा अंबर नहीं कोई
दुखों के एक डोरी से यहाँ बंधे हैं सब के सब
ये फिर भी टूट जाते हैं, यहाँ पत्थर नहीं कोई !
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दुआ रब से ये है मेरी कि हर खुशियाँ मिले तुझको
ख़ुदा से आज तेरे हिस्से का हर गम मैं लेता हूँ;

न मेरे पास है वो चीज़ जो तुझसे भी बढ़कर हो
मैं बस अल्फाज़ से तुझको मुबारकबाद देता हूँ !!!

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लोग कहते हैं,सच्ची मोहब्बत सिर्फ एक बार होती है
मेरा ख्याल है, अगर मोहब्बत सच्ची हो तो बार-बार होती है!
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अदा दिल को सताने की, हसीनों से कोई सीखे;
वो देकर ज़ख्म दिल को,पूछते हैं हाल कैसा है !
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उजाला इस क़दर फैला यहाँ तेरी मोहब्बत का,

कि तेरा चाँद तेरी रौशनी में आज ही ग़ुम है !!

ये ज़रूरी नहीं कि तू वो ही कहे जो मुझे पसंद हो,
ज़रूरी है कि तू वो ना कहे जो मुझे नापसंद हो !!
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तुझे हर वक़्त सजदे में मैं अपनी याद करता हूँ,
तेरा दीदार हो रब से यही फ़रियाद करता हूँ
मैं अंजाँ हूँ मेरे बारे में तेरी सोच कैसी है,
बस इतना जानता हूँ कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ !!
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बहुत नादान हूँ मैं,आपकी इज्ज़त जो करता हूँ
कभी ना बात कोई आप बा-तहज़ीब कहती हैं;
मैं अपनी बेबसी पर आज भी ख़ामोश रहता हूँ
न जाने आप क्यूँ आखिर मुझे पागल समझती हैं !
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मै तुझे सोचा था जो समझा था,,वो पाया नहीं
दोस्ती के मायने अब तक तुझे आया नहीं !!
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न जाने आज का दिन क्या नयी सौगात लाया है,
कि मेरा यार मेरे पास अरसे बाद आया है !!
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तुझे आगाह करता हूँ कि उससे इश्क न फरमा,
वगरना बेवफाई कर वो इक दिन भूल जाएगी !!

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शिक़ायत हर कोई सुनता यहाँ ख़ामोश होठों की,
मगर हँसता हुआ चेहरा यहाँ कोई नहीं पढता !

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मैं ये नहीं कहता कि औरों के घरों में दिए जलाओ,
बस ये इल्तजा है कि किसी के घर का दिया न बुझे !!
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अंधरे में रहकर उजाले को देखो,
वहाँ भी तुम्हें एक अंधेरा मिलेगा।
इसी मोड़ पर कल मिला साँझ तुझको
इसी मोड़ पर अब सवेरा मिलेगा।
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जेब में सिक्के पड़े थे, खो गए
आज सब अपने पराए हो गए।
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हर किसी का हिसाब होता है,
झूठ जब बेनकाब होता है।
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जब भी आया करे तुम्हें हिचकी,
मुझको इक बददुआ अता करना।
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जो उसको ढूँढ़ने निकला मिला इक आदमी से मैं, 
मगर मिलने पे ये क्या, मैं खुदी को भूल कर आया।
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ज़माने भर के लोगों से मिला हूं,
मिले ख़ुद से ज़माना हो गया है।

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मिले उससे ज़माना हो गया है,
ये रिश्ता अब पुराना हो गया है।
हम अपने ख़्वाब को बस छोड़ आए,
अलग उसका ठिकाना हो गया है।

रोटियां हिस्से की मेरी, अब मुझे मिलतीं नहीं

रोटियां हिस्से की मेरी, अब मुझे मिलतीं नहीं
पूछता हूँ, रोटियां आख़िर वो खाता कौन है


आज कल मंडप का दूल्हा, बनता भ्रष्टाचार है
बन गयी दुल्हन शराफ़त पर पुजारी कौन है


मैं ख़ुदी को भूलकर उनको दिलाया शोहरतें
एक गुमनामी के कारण क़द मेरा अब बौन है


है भरा धुओं से कमरा, पर मैं साँसें ले रहा
इन विषैली सी धुओं में वो हवा अब गौण है


सदियों से ताले पड़े हैं आज तक इस कमरे में
रात के सन्नाटे में आवाज़ देता कौन है


कल रही चर्चा शहर में कि बड़ा बुज़दिल हूँ मैं
देख जलता घर मेरा अब लोग सारे मौन हैं


आज मेरी बेबसी पर है हवा भी रुक गयी
है कलम थम सी गयी, और शब्द भी अब मौन है

देखा है आज हमने लोगों को आज़माकर

देखा है आज हमने लोगों को आज़माकर
देते हैं लोग धोखा दिल के करीब आकर


चोटें सहीं हैं हमने बर्बाद-ए-मोहब्बत के
लो टूट गया पत्थर इक शीशे से टकराकर


लगता है डर सा अब तो मुस्कान देख उनकी
रखें हों उसने शायद खंज़र कहीं छिपाकर


मालिक ! मेरे बता तू वो खो गया किधर है
इक सांस ले सकूँ मैं जिसकी तलाश पाकर


मेरे बीमार दिल की बस एक ही दवा है
रुखसत वो मुझको कर दे,और देखे मुस्कुरा कर

अपने अंजाम-ए-मोहब्बत को भूल कर बैठा

अपने अंजाम-ए-मोहब्बत को भूल कर बैठा
आज फिर आदमी बनने की भूल कर बैठा


रब से माँगा था वक़्त तुझसे बातें करने को
वक़्त पाया तो मैं बातें फ़िज़ूल कर बैठा


बाद मुद्दत के मुझे थोड़ी सी खुशियाँ जो मिलीं
उनको मंजिल समझ मैं फिर गुरूर कर बैठा


अपनी आदत से मैं मजबूर एक आशिक़ हूँ
आज इज़हार-ए-मोहब्बत हुज़ूर कर बैठा


आज गुज़रा हुआ हर वक़्त मुझसे कहता है
हाय ‘कुंदन’ तू ये इश्क में क्या कर बैठा l