Wednesday, 25 January 2017

ग़म की अँधेरी रात है न कोई मेरे साथ है

ग़म की अँधेरी रात है न कोई मेरे साथ है,
थे क़ाफ़िले उजालों में न कोई आज पास है


मैं इसका शोक क्यूँ करूँ कि लोग बेवफा हुए,
न कल भी कोई ख़ास था न अब भी कोई ख़ास है


तमाम उम्र मैंने तो मुसीबतों से सीखा है,
न दुश्मनों का खौफ़ था न दोस्तों कि आस है


क्यूँ मेरा हाल देखकर है फूल भी मुरझा उठा,
मैं ख़ुद भी होश में नहीं औ वो भी बदहवास है


तमाम यादें दफ़्न कर चला शहर मैं छोड़ कर,
बुलाता मुझको कौन है ये कौन अब उदास है


‘कुंदन’ तू फ़िक्र छोड़ दे यहाँ न कोई है तेरा,
क्यूँ तुझको रोके भी कोई न तू किसी को रास है

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